हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,तेहरान। हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सिद्दीकी ने कहा कि केवल इबादत करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि तज़किया-ए-नफ़्स और आंतरिक पवित्रता के बिना इंसान सच्चे ईमान और अल्लाह की क़ुर्बत तक नहीं पहुँच सकता।
उन्होंने मस्जिद-ए-जामे में आयोजित अख़्लाक़ की कक्षा में सूरह अनफ़ाल की शुरुआती आयतों का उल्लेख करते हुए कहा कि क़ुरआन इंसान को पूर्ण ईमान तक पहुँचाने के लिए पाँच महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उपाय बताता है अल्लाह का ज़िक्र, नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, दुआ और तज़किया-ए-नफ़्स।
उन्होंने कहा कि क़ुरआन में सच्चे मोमिनों की पहली पहचान यह बताई गई है कि "जब अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है तो उनके दिल काँप उठते हैं।" यही आंतरिक परिवर्तन इंसान को पूर्ण ईमान के करीब लाता है।सिद्दीकी ने कहा कि नमाज़, क़ुरआन और दुआ, अल्लाह के ज़िक्र के सबसे महत्वपूर्ण रूप हैं। क़ुरआन ग़फ़लत को दूर कर इंसान के दिल को अल्लाह से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि सच्ची नमाज़ केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि वह इंसान को पापों से रोकती है और उसके आध्यात्मिक विकास का माध्यम बनती है। सही नमाज़ इंसान को हसद घमंड, रियाकारी और अन्य नैतिक बुराइयों से दूर करती है।
इमाम हसन मुजतबा (अ.स.) के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा,जो व्यक्ति इबादत चाहता है, उसे पहले अपने नफ़्स का तज़किया करना चाहिए।इसलिए आत्मशुद्धि के बिना इबादत इंसान को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती।
उन्होंने इबादत में रियाकारी के ख़तरे से आगाह करते हुए कहा कि दिखावे के साथ पढ़ी गई नमाज़ इंसान को अल्लाह के क़रीब नहीं लाती, बल्कि उसके पतन का कारण बनती है। क़ुरआन भी ऐसे लोगों के बारे में चेतावनी देता है जो केवल लोगों को दिखाने के लिए नमाज़ पढ़ते हैं।
उन्होंने कहा कि सच्ची नमाज़ न केवल गुनाहों से बचाती है बल्कि यदि इंसान से कोई गलती हो जाए तो तौबा और सुधार का रास्ता भी खोलती है। गुनाह के बाद नमाज़ के माध्यम से इंसान अपने गुनाहों की आग को बुझा सकता है।सिद्दीकी ने कहा कि अल्लाह, पैग़म्बर (स.ल.) और उसके नेक बंदों से कोई भी कर्म छिपा नहीं है। इसलिए मोमिन को हमेशा यह एहसास रखना चाहिए कि वह हर समय अल्लाह की निगरानी में है।
उन्होंने मरहूम शेख़ मुहम्मद हुसैन इस्फ़हानी का एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वह नमाज़ से पहले लंबे समय तक अल्लाह की बारगाह में उपस्थित होने की महानता पर विचार करते थे और स्वयं को उस आध्यात्मिक यात्रा के लिए तैयार करते थे।
अंत में उन्होंने कहा कि एक सच्चा मोमिन अल्लाह के ज़िक्र, नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, दुआ और तक़वा के माध्यम से अपने अहंकार से ऊपर उठकर अल्लाह की असीम रहमत से जुड़ सकता है। यही वह अवस्था है जिसका वर्णन क़ुरआन ने सच्चे ईमान वालों के लिए किया है।
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